महंगाई ने पराली जलाने पर लगा दिया ब्रेक, आख़िर क्या है वजह
Inflation put brakes on stubble burning what is the reason
भूसा व चारे के बढ़ते दामों ने इस बार पराली जलाने की घटनाओं पर ब्रेक लगा दिया है। यही वजह है कि इस बार पराली जलाने की घटनाओं का ग्राफ ना के बराबर रह गया
पराली ना जलाने को लेकर सरकार करती है प्रचार प्रसार
धान की पराली को जलाने से रोकने के लिए पिछले कई वर्षों से सरकार लगातार प्रयास कर रही है। पराली जलाने से निकलने वाला धुंआ हवा में घुलकर घुटन व आंखों मेचुभन पैदा कर देता है।
जिससे लोगों को सांस लेने सहित कई अन्य तरह की दिक्क्क्त पैदा होती है।इसी को लेकर एनजीटी के आदेश पर सरकार ने किसानों को पराली जलाने से रोकने के लिए उसके सदुपयोग के बारे में प्रचार प्रसार किया। वहीं, पराली जलाने वाले किसानों के खिलाफ कार्रवाई तक की गई।
इसके बावजूद पराली जलाने का सिलसिला थमा नहीं। लेकिन इस बार भूसे व चारे के बढ़ते दामों ने पशु पालकों के सामने चारे की समस्या खड़ी कर दी है।
पराली नहीं जलने के दो मुख्य कारण
इस बार क्षेत्र में धान की कटाई के लिए मशीनों की उपलब्धता हो गई। 80 प्रतिशत किसानों ने इस बार अपनी धान की फसल को मशीनों से कटवाया है। इससे किसानों का धधान की कटाई पर खर्चा कम हो गया है।
तो दूसरी तरफ पांच दिनों तक धान को निकालने आदि की प्रक्रिया में लगने वाला कई दिनों का समय चंद घण्टों में तब्दील हो गया। अवशेषों को किसानों ने रोडावेटर से काट पानी भर दिया, जिससे खेतों में हरी खाद लग गई।
इसका दूसरा सबसे बड़ा कारण चारे की किल्लत रही। इस बार भूसे के दाम1500 रुपये प्रति क्विटल तक पहुंच गए। वहीं ज्वार भी चार से पांच हजार रुपये प्रति बीघा तक बेची गई।
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